माँ

​एक अरसा हुआ तुझको देखे हुए,
अँखियों में अब भी बस्ती है तू,
रातियों को जगता हूँ, कहीं तो मेरे संग आज भी जगती है तू,
सपने लिए जो जी रहा हूँ अँखियों में,तो तूने ही संजोय होंगे माँ,
गुपचुप खुद से बातें करता, कुछ तो तू भी सुनती होगी,
आज भी याद आती है तेरी,  माँ तुझको भी तो आती होगी।

कलम पकड़ना सीखा ही था, दूर कहीं तू चली गयी,
आज कलम शब्द करता हूँ तो, कभी तो तू भी पढ़ती होगी,
तकिये पर सर रखकर जब मैं अँखियाँ मूँद सो जाता हूँ,
गोद तो माँ तुझको भी अपनी सूनी लगती होगी,
सूख चूका जो अखियन से अब आँसू का जो दरिया था,
दूर हुई जो मझसे तू , एकल में तो रोई होगी,
आज भी याद आती है तेरी, माँ तुझको भी तो आती होगी

जीना अभी तो सीख रहा था, जाने कहाँ तू चली गयी,
नन्ही सी उन आँखों में अपनी यादें छोड़ गयी
कुछ बोला ना पास बुलाया, खुद संग सब कुछ ले चली,
नन्हे से उस बच्चे में प्रशन कितने छोड़ गयी,
जब उलझा तू देखती होगी, जीवन के इस चक्रे में,
उत्तर लेकर तू भी माँ राह तो मेरी तकती होगी,
आज भी याद आती है तेरी, माँ तुझको भी तो आती होगी।

आज भी जीवन के कुछ पन्ने माँ तेरे लिए कोरे रखें हैं,
जाने कब तू आ जाये और स्याही से कुछ लिख दे माँ,
तेरे जीवन में भी तो, वही कुछ पन्ने कोरे हैं,
गुपचुप खुद से बातें करता, कुछ तो तू भी सुनती होगी,
आज भी याद आती है तेरी,  माँ तुझको भी तो होगी।

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6 thoughts on “माँ

    1. Extremely touching and even the unknown feelings in one person can be revived after reading this. It is the finest and best for me in all poetries I have read till date. Loads of love and keep writing and contributing to this society :*

      Liked by 1 person

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