लम्हे

​जाने ये कैसे लम्हे हैं, जो थमते हैं ना कटते हैं
वो दिन जो सारे बीत चुके, जो रहते हैं ना मिटते हैं
इक सुर्ख रंग है यादों का, पल-पल जो सामने दिखता है
कुछ चेहरे हैं धुंधले-धुंधले, जो आंखो से ना हटते हैं
जाने ये कैसे लम्हे हैं, जो थमते हैं ना कटते हैं
वो दिन जो सारे बीत चुके, जो रहते हैं ना मिटते हैं

कमरे का अंधेरा भी अब तो, अपना-अपना सा लगता है
इक चेहरे में ही खो जाना, अब तो इक सपना लगता है
दो पहर तो यूं ही बीत चुके, इस काली ठंडी रैना के
जाने ये कैसे लम्हे हैं, जो थमते हैं ना कटते हैं
वो दिन जो सारे बीत चुके, जो रहते हैं ना मिटते हैं

आंखों में चादर पसरी है, इक धुंधले-धुंदले पानी की
जो बहता है ना रुकता है, दिल की इक अजब बेचैनी की,
जाने ये कैसे लम्हे हैं, जो थमते हैं ना कटते हैं
वो दिन जो सारे बीत चुके, जो रहते हैं ना मिटते हैं

कुछ पल को सही बस थम जाये, ये एकल की जो पहरी है
उलझी सी जो गुज़र रही,वो चुभती-चुभती सहरी है
ये बह जाये तो मुनासिब है, ये लम्हे शायद कट जायें
हठ करके दिल में बैठ गये, ना सुनते कुछ ना कहते हैं
जाने ये कैसे लम्हे हैं, जो थमते हैं ना कटते हैं
वो दिन जो सारे बीत चुके, जो रहते हैं ना मिटते हैं

                                   -साहिर‘‘गगन’’

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