Childhood Days

The chirping of birds,
And the rising sun,
 The wakeup call,
And the crumbled sheet.
These rushing hours,
And devoid of sleep.
Burdened eyes,
And the trudging mind.
A child in me looks for childhood days.

Day too long,
But time runs short.
And the pell-mell of ascending ladder I see.
Long lost trail of impishness,
And the forlorn figure of me.
To the smile,
And the impeccable face.
A child in me looks for childhood days.

Tattered soul,
And the grotesque limbs,
Weary me and the broken wings.
Shade of peace,
And the joy of love,
These blank pages,
And the bottle of ink.
A child in me looks for childhood days.

लम्हे

​​जाने ये कैसे लम्हे हैं, जो थमते हैं ना कटते हैं
वो दिन जो सारे बीत चुके, जो रहते हैं ना मिटते हैं
इक सुर्ख रंग है यादों का, पल-पल जो सामने दिखता है
कुछ चेहरे हैं धुंधले-धुंधले, जो आंखो से ना हटते हैं
जाने ये कैसे लम्हे हैं, जो थमते हैं ना कटते हैं
वो दिन जो सारे बीत चुके, जो रहते हैं ना मिटते हैं

कमरे का अंधेरा भी अब तो, अपना-अपना सा लगता है
इक चेहरे में ही खो जाना, अब तो इक सपना लगता है
दो पहर तो यूं ही बीत चुके, इस काली ठंडी रैना के
जाने ये कैसे लम्हे हैं, जो थमते हैं ना कटते हैं
वो दिन जो सारे बीत चुके, जो रहते हैं ना मिटते हैं

आंखों में चादर पसरी है, इक धुंधले-धुंदले पानी की
जो बहता है ना रुकता है, दिल की इक अजब बेचैनी की,
जाने ये कैसे लम्हे हैं, जो थमते हैं ना कटते हैं
वो दिन जो सारे बीत चुके, जो रहते हैं ना मिटते हैं

कुछ पल को सही बस थम जाये, ये एकल की जो पहरी है
उलझी सी जो गुज़र रही,वो चुभती-चुभती सहरी है
ये बह जाये तो मुनासिब है, ये लम्हे शायद कट जायें
हठ करके दिल में बैठ गये, ना सुनते कुछ ना कहते हैं
जाने ये कैसे लम्हे हैं, जो थमते हैं ना कटते हैं
वो दिन जो सारे बीत चुके, जो रहते हैं ना मिटते हैं

                                   -साहिर‘‘गगन’’

माँ

​एक अरसा हुआ तुझको देखे हुए,
अँखियों में अब भी बस्ती है तू,
रातियों को जगता हूँ, कहीं तो मेरे संग आज भी जगती है तू,
सपने लिए जो जी रहा हूँ अँखियों में,तो तूने ही संजोय होंगे माँ,
गुपचुप खुद से बातें करता, कुछ तो तू भी सुनती होगी,
आज भी याद आती है तेरी,  माँ तुझको भी तो आती होगी।

कलम पकड़ना सीखा ही था, दूर कहीं तू चली गयी,
आज कलम शब्द करता हूँ तो, कभी तो तू भी पढ़ती होगी,
तकिये पर सर रखकर जब मैं अँखियाँ मूँद सो जाता हूँ,
गोद तो माँ तुझको भी अपनी सूनी लगती होगी,
सूख चूका जो अखियन से अब आँसू का जो दरिया था,
दूर हुई जो मझसे तू , एकल में तो रोई होगी,
आज भी याद आती है तेरी, माँ तुझको भी तो आती होगी

जीना अभी तो सीख रहा था, जाने कहाँ तू चली गयी,
नन्ही सी उन आँखों में अपनी यादें छोड़ गयी
कुछ बोला ना पास बुलाया, खुद संग सब कुछ ले चली,
नन्हे से उस बच्चे में प्रशन कितने छोड़ गयी,
जब उलझा तू देखती होगी, जीवन के इस चक्रे में,
उत्तर लेकर तू भी माँ राह तो मेरी तकती होगी,
आज भी याद आती है तेरी, माँ तुझको भी तो आती होगी।

आज भी जीवन के कुछ पन्ने माँ तेरे लिए कोरे रखें हैं,
जाने कब तू आ जाये और स्याही से कुछ लिख दे माँ,
तेरे जीवन में भी तो, वही कुछ पन्ने कोरे हैं,
गुपचुप खुद से बातें करता, कुछ तो तू भी सुनती होगी,
आज भी याद आती है तेरी,  माँ तुझको भी तो होगी।

दादी

best pencil drawingकुछ ख्वाब हैं अनकहे, कुछ ख्वाइशें अधूरी सी,
दादी बस उस खटिया पर खुद में ही ग़ुम रहती हैं।

ख़ामोशी है उन लबों पर, जो कभी कहानियां कहा करते थे,
आँसू हैं उन आँखों में, जो सपने दिखाया करतीं थी

लोरी तो अब खो ही चुकी है, कमरे के उस कोने में
रतिया कटे है जगते जगते, दिन कटे हैं सोने में

बूढी आँखों भी चुप सी हैं, न कुछ सुनती ना कहती हैं
जिन हाथों ने जीना सीखाया, वही हथेली खाली है

Seclusion

IMG_20160612_153154130_1465725860643_wmIn the hour of  noon when the sun was at its zenith,
Amid his seclusion he was struggling with his thoughts.
Thoughts which would make anyone’s day gloomy,
Thoughts which ponder upon him a sheet of desolation.
Thoughts which unable him to look beyond himself,
Thoughts more dreadful than a ghost.

Amid his seclusion, his shadow being his lone listner,
Shadow which is detachable to him or he is detachable to his shadow.
On the verge of drowning into himself, searching for the ray of new dawn,
Searching for the happiness, the call of hope,
That will Succour him to swim among his choking thoughts.

And there he was sitting all this noon, juggling with the thoughts,
Or rather the thoughts were juggling with him.
Thoughts playing with his countenance, creating a wrath over him,
A sudden plunge of ecstasy ran through him, kindling him to rejoice.
Breaking the shackles of woe,
A sense of tranquility filling his surroundings.

Reinvigorated he stands there, like a warrior who fought the darkness of his thoughts,
Winning a battle that many are still a victim of,
Bleeding with endeavor, a drop of sweat and the wisdom of a revived being were his trophies,
Amid bedlam, with those flickering eyes, he stood with a grin,
Akin to conqueror he stands with a flag of victory over his demons.

सपने

फटे कपड़े, फटे हाल,
तलुओं पर धूप से तपती सड़क की मार
डगर डगर, शहर शहर घूमता,
और तपी सड़क पर नंगे बदन सो जाने वाला वह,
सपने तो होंगे कुछ उसकी मैल से गिजगिजाती आंखों में भी,

आठ पहर भूख की मार,
सूख चुके हैं आॅसू भी अब, बेमतलब हो चुका प्यार
चोखट चोखट, दुत्कार-ओ-ठोकर 
पर अपनी ही धुन में रहा गुजार,
सपने तो होंगे कुछ उसकी मैल से गिजगिजाती आंखों में भी

सोच

कुछ यूँ ही बैठकर सोचा करते हैं,
सोच, जिसपर ना कभी किसी का अधिकार रहा है, ना कभी रह पायेगा,
ये तो बस पनपती है आसपास के वातावरण से,

कुछ यूँ ही बैठकर सोचा करते हैं,
क्या सोचता होगा वह बच्चा जिसने तो अभी सिर्फ जन्म लिया है,
क्या सोचता होगा वह बच्चा जो आज भी दिनभर चिलचिलाती धूप में थककर भूखा सोया है,

कुछ यूँ ही बैठकर सोचा करते हैं,
क्या सोचता होगा वह बच्चा जो उस सर्दी में ठिठुरकर भी सड़क के किनारे रात गुज़ार देता है,
क्या सोचता होगा वह बच्चा जो दिनभर कबाड़ मन किताबें तो खरीदता है पर उनको खोल कर पढ़ना उसको सीखाया नही जाता।

बस कुछ यूँ ही बैठकर सोचा करते हैं,
ना जाने कबतक सोच तक ही सिमित रह जाएँगी ये देखी देखी सी तकलीफें।